(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.255. अध्यायः 255
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति ज्ञानादिप्रशंसापरव्यासवाक्यानुवादः॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

व्यास उवाच। 12-255-0x(6260)(75620)
सृजते त्रिगुणान्सत्वं क्षेत्रज्ञस्त्वधितिष्ठति।
गुणान्विक्रियते सर्वानुदासीनवदीश्वरः॥ 12-255-1(75621)
स्वभावयुक्तं तत्सत्वं यदिमान्सृजते गुणान्।
ऊर्णनाभिर्यथा सूत्रं सृजते तन्तुवद्गुणान्॥ 12-255-2(75622)
प्रध्वस्ता न निवर्तन्ते प्रवृत्तिर्नोपलभ्यते।
एवमेके व्यवस्यन्ति निवृत्तिरिति चापरे॥ 12-255-3(75623)
उभयं संप्रधार्यैतदध्यवस्येद्यथामति।
अनेनैव विधानेन भवेद्गर्भशयो महान्॥ 12-255-4(75624)
अनादिनिधनं नित्यं तं बुद्ध्वा विचरेन्नरः।
अक्रुध्यन्नप्रहृष्यंश्च नित्यं विगतमत्सरः॥ 12-255-5(75625)
इत्येवं हृदयग्रन्थिं बुद्धिचिन्तामयं दृढम्।
अतीत्य सुखमासीत अशोचंश्छिन्नसंशयः॥ 12-255-6(75626)
ताम्येयुः प्रच्युताः पृथ्व्यां यथा पूर्णां नदीं नराः।
अवगाढा ह्यविद्वांसो विद्धि लोकमिमं तथा॥ 12-255-7(75627)
न तु ताम्यति वै विद्वान्स्थले चरति तत्त्ववित्।
एवं यो विन्दतेऽऽत्मानं केवलं ज्ञानमात्मनः॥ 12-255-8(75628)
एवं बुद्ध्वा नरः सर्वं भूतानामागतिं गतिम्।
समवेक्ष्य च वैषम्यं लभते शममुत्तमम्॥ 12-255-9(75629)
एतद्वै जन्मसामर्थ्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः।
आत्मज्ञानं शमश्चैव पर्याप्तं तत्परायणम्॥ 12-255-10(75630)
एतद्बुद्ध्वा भवेद्बुद्धः किमन्यद्बुद्धलक्षणम्।
विज्ञायैतद्विमुच्यन्ते कृतकृत्या मनीषिणः॥ 12-255-11(75631)
न भवति विदुषां महद्भयं
यदविदुषां सुमहद्भयं परत्र।
न हि गतिरधिकाऽस्ति कस्यचि
द्भवति हि या विदुषः सनातनी॥ 12-255-12(75632)
लोकमातुरमसूयते जन
स्तत्तदेव च निरीक्ष्य शोचते।
तत्र पश्य कुशलानशोचतो
ये विदुस्तदुभयं कृताकृतम्॥ 12-255-13(75633)
यत्करोत्यनभिसन्धिपूर्वकं
तच्च निर्णुदति ---
न प्रियं तदुभयं न चाप्रिय
तस्य तज्जनयतीह कुर्वतः॥ ॥ 12-255-14(75634)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 255॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-255-2 ऊर्णनाभिर्यथा सत्वमिति ट. ड. पाठः॥ 12-255-7 नात्येयुः प्रच्युता इति ध. पाठः॥


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